इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में भारत की अर्थव्यवस्था एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ी है जहाँ विकास, स्थिरता, समावेशन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन स्थापित करना केवल नीतिगत विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अनिवार्यता बन चुका है। कोविड-19 महामारी के झटकों, भू-राजनीतिक तनावों, आपूर्ति-श्रृंखला व्यवधानों और जलवायु परिवर्तन जैसी बहुस्तरीय चुनौतियों के बीच भारत ने जिस प्रकार अपनी आर्थिक रणनीतियों को पुनर्परिभाषित किया है, वह वैश्विक नीति-परिदृश्य में अध्ययन का विषय है। आज भारत न केवल उच्च विकास दर की आकांक्षा रखता है, बल्कि वह एक ऐसी अर्थव्यवस्था का निर्माण करना चाहता है जो तकनीकी रूप से सक्षम, वित्तीय रूप से अनुशासित, सामाजिक रूप से समावेशी और पर्यावरणीय दृष्टि से टिकाऊ हो।भारत की आर्थिक रणनीति का मूलाधार मैक्रोइकोनॉमिक स्थिरता है, जिसमें राजकोषीय अनुशासन, मुद्रास्फीति नियंत्रण, और वित्तीय प्रणाली की सुदृढ़ता प्रमुख घटक हैं। सरकार ने पिछले वर्षों में राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने, पूंजीगत व्यय को प्राथमिकता देने, और कर-आधार के विस्तार पर विशेष ध्यान दिया है। वस्तु एवं सेवा कर (GST) ने कर-संरचना को सरल बनाने, अनुपालन बढ़ाने और राज्यों के साथ समन्वय को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यद्यपि प्रारंभिक वर्षों में राजस्व-संग्रह और तकनीकी समायोजन संबंधी चुनौतियाँ रहीं, परंतु दीर्घकाल में GST ने एक एकीकृत राष्ट्रीय बाजार के निर्माण की दिशा में निर्णायक कदम सिद्ध किया है। राजकोषीय नीति के स्तर पर सरकार ने बुनियादी ढाँचे, लॉजिस्टिक्स, डिजिटल नेटवर्क, और हरित ऊर्जा में निवेश बढ़ाकर विकास की आधारभूत संरचना को सुदृढ़ करने का प्रयास किया है।मौद्रिक नीति के संदर्भ में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढाँचे के अंतर्गत मूल्य-स्थिरता को केंद्र में रखते हुए संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है। महामारी के दौरान तरलता समर्थन, ऋण पुनर्गठन और ब्याज-दरों में समायोजन के माध्यम से अर्थव्यवस्था को सहारा दिया गया, जबकि बाद के चरणों में मुद्रास्फीति के दबावों के अनुरूप नीतिगत सख्ती अपनाई गई। यह संतुलन भारत की आर्थिक विश्वसनीयता के लिए महत्वपूर्ण रहा है, क्योंकि उच्च मुद्रास्फीति निवेश, बचत और उपभोग के व्यवहार को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकती है। वित्तीय प्रणाली की स्थिरता हेतु बैंकिंग क्षेत्र में पूंजीकरण, एनपीए समाधान, और डिजिटल भुगतान अवसंरचना के विस्तार ने संरचनात्मक मजबूती प्रदान की है।उत्पादन और विनिर्माण को प्रोत्साहित करने के लिए भारत की रणनीति ‘मेक इन इंडिया’ और उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं के माध्यम से स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोबाइल, सेमीकंडक्टर, और नवीकरणीय ऊर्जा उपकरण जैसे क्षेत्रों में PLI योजनाओं ने निवेश आकर्षित करने, घरेलू उत्पादन बढ़ाने और निर्यात प्रतिस्पर्धा को मजबूत करने का उद्देश्य रखा है। वैश्विक आपूर्ति-श्रृंखलाओं के पुनर्संतुलन के इस दौर में भारत स्वयं को एक विश्वसनीय, लागत-प्रभावी और तकनीकी रूप से सक्षम विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करना चाहता है। हालाँकि भूमि-अधिग्रहण, श्रम-नियमों की जटिलता, और लॉजिस्टिक लागत जैसी चुनौतियाँ अभी भी विद्यमान हैं, परंतु श्रम-संहिताओं का सरलीकरण, ‘गति शक्ति’ जैसी पहलें, और औद्योगिक गलियारों का विकास इन बाधाओं को कम करने की दिशा में कदम हैं।डिजिटल अर्थव्यवस्था भारत की आर्थिक रणनीति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ बनकर उभरी है। आधार, यूपीआई, डिजिलॉकर और जनधन खातों के त्रिकोण ने वित्तीय समावेशन, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) और डिजिटल लेनदेन को नई गति प्रदान की है। यूपीआई की सफलता ने न केवल भुगतान प्रणाली में क्रांतिकारी परिवर्तन किया है, बल्कि सूक्ष्म उद्यमों, स्टार्टअप्स और उपभोक्ताओं के बीच लेनदेन लागत को न्यूनतम किया है। डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (Digital Public Infrastructure) का यह मॉडल विश्व स्तर पर सराहा गया है। ई-कॉमर्स, फिनटेक, एडटेक और हेल्थटेक जैसे क्षेत्रों में नवाचार भारत की उत्पादकता वृद्धि और सेवा-निर्यात क्षमता को सुदृढ़ कर रहे हैं। साथ ही, डेटा सुरक्षा, साइबर जोखिम और डिजिटल साक्षरता के प्रश्न नीति-निर्माताओं के समक्ष नई जिम्मेदारियाँ भी प्रस्तुत करते हैं।जनसांख्यिकीय परिप्रेक्ष्य में भारत की युवा आबादी एक संभावित ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ का संकेत देती है। किंतु यह लाभ स्वतःस्फूर्त नहीं, बल्कि कौशल-विकास, शिक्षा की गुणवत्ता, स्वास्थ्य निवेश और रोजगार-सृजन की प्रभावी नीतियों पर निर्भर है। स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, और उद्यमिता प्रोत्साहन कार्यक्रमों का उद्देश्य कार्यबल की उत्पादकता और नवाचार क्षमता को बढ़ाना है। श्रम-बाजार में औपचारिकता बढ़ाने, महिला श्रम-भागीदारी को प्रोत्साहित करने और गिग-इकोनॉमी के लिए नियामक स्पष्टता स्थापित करने की आवश्यकता निरंतर महसूस की जा रही है। यदि शिक्षा और कौशल के बीच संतुलन स्थापित नहीं हुआ, तो जनसांख्यिकीय लाभांश सामाजिक-आर्थिक दबाव में परिवर्तित हो सकता है।कृषि क्षेत्र, जो भारत की बड़ी आबादी के जीवन-निर्वाह का आधार है, आर्थिक रणनीति में संरचनात्मक सुधारों की अपेक्षा करता है। उत्पादन-वृद्धि के साथ-साथ मूल्य-संवर्धन, भंडारण, प्रसंस्करण, और आपूर्ति-श्रृंखला दक्षता पर बल देना आवश्यक है। जैविक खेती, कृषि-तकनीक, ड्रोन उपयोग, और डिजिटल मंडी प्लेटफॉर्म जैसी पहलें किसानों की आय वृद्धि और जोखिम प्रबंधन में सहायक हो सकती हैं। कृषि सुधारों के प्रयासों में राजनीतिक-सामाजिक विमर्श और हितधारकों के बीच विश्वास-निर्माण की चुनौती स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। ग्रामीण मांग को सुदृढ़ करना, गैर-कृषि रोजगार बढ़ाना और ग्रामीण अवसंरचना में निवेश समग्र आर्थिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण हैं।बुनियादी ढाँचा भारत की दीर्घकालिक विकास रणनीति का केंद्रीय तत्व है। सड़क, रेल, बंदरगाह, हवाई अड्डे, ऊर्जा नेटवर्क और शहरी अवसंरचना में निवेश न केवल प्रत्यक्ष रोजगार उत्पन्न करता है, बल्कि उत्पादकता, लॉजिस्टिक दक्षता और क्षेत्रीय संतुलन को भी प्रोत्साहित करता है। ‘राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन’ और ‘गति शक्ति’ जैसी योजनाएँ बहु-मोडल कनेक्टिविटी और परियोजना-समन्वय को बेहतर बनाने का प्रयास हैं। अवसंरचना वित्तपोषण हेतु सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP), विकास वित्त संस्थान (DFI), और परिसंपत्ति मुद्रीकरण जैसे उपकरणों का उपयोग नीति-प्रणाली में नवाचार को दर्शाता है।वैश्विक व्यापार और निवेश के संदर्भ में भारत की रणनीति संतुलित संरक्षणवाद और प्रतिस्पर्धात्मक उदारीकरण के बीच गतिशील रूप से विकसित हो रही है। मुक्त व्यापार समझौतों, निर्यात प्रोत्साहन, और आत्मनिर्भरता के लक्ष्यों के बीच नीति-संतुलन चुनौतीपूर्ण है। वैश्विक मूल्य-श्रृंखलाओं में एकीकृत होने के लिए भारत को गुणवत्ता मानकों, लागत प्रतिस्पर्धा, और नियामक पारदर्शिता में सुधार जारी रखना होगा। सेवा-निर्यात, विशेषकर आईटी, फार्मास्यूटिकल्स और प्रोफेशनल सेवाओं में भारत की स्थिति मजबूत है, किंतु विनिर्माण निर्यात में अभी भी पर्याप्त संभावनाएँ अप्रयुक्त हैं।हरित विकास और सतत अर्थव्यवस्था आज भारत की आर्थिक रणनीति का अभिन्न अंग बन चुके हैं। नवीकरणीय ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, और कार्बन न्यूनीकरण लक्ष्यों के माध्यम से भारत पर्यावरणीय दायित्व और आर्थिक अवसरों का संयोजन करने का प्रयास कर रहा है। जलवायु परिवर्तन के जोखिमों—जैसे चरम मौसम, कृषि उत्पादकता पर प्रभाव, और स्वास्थ्य चुनौतियाँ—को देखते हुए हरित निवेश केवल नैतिक दायित्व नहीं, बल्कि आर्थिक विवेक का प्रश्न भी है। वित्तीय प्रणाली में ESG (Environmental, Social, Governance) ढाँचे का समावेशन और हरित बांड जैसे उपकरण इस दिशा में सहायक हो सकते हैं।इन सभी रणनीतियों के मध्य भारत को जिन जोखिमों और चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, उनमें वैश्विक मंदी, भू-राजनीतिक अस्थिरता, ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव, रोजगार गुणवत्ता, और आय असमानता प्रमुख हैं। उच्च विकास दर के साथ समावेशी विकास सुनिश्चित करना नीति-निर्माण की सबसे जटिल परीक्षा है। सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य निवेश, और शिक्षा सुधारों के माध्यम से मानव पूंजी को सुदृढ़ करना दीर्घकालिक आर्थिक प्रतिस्पर्धा का आधार बनेगा।अंततः भारत की आर्थिक रणनीति एक निरंतर विकसित होती प्रक्रिया है, जिसमें नीतिगत लचीलापन, संस्थागत सुदृढ़ता और सामाजिक सहमति की आवश्यकता है। विकास और स्थिरता के बीच संतुलन, आत्मनिर्भरता और वैश्विक एकीकरण के बीच सामंजस्य, तथा तकनीकी प्रगति और सामाजिक समावेशन के बीच समन्वय ही भारत को एक सुदृढ़, न्यायसंगत और टिकाऊ अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर कर सकते हैं। भारत की यह यात्रा केवल आँकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि आकांक्षाओं, संरचनात्मक परिवर्तन और सामूहिक भविष्य-दृष्टि का दस्तावेज़ है।

